आज का हिन्दू पंचांग
दिनांक – ३० अक्टूबर २०२५
दिन – गुरुवार
विक्रम संवत् – २०८२
अयन – दक्षिणायण
ऋतु – हेमंत
मास – कार्तिक
पक्ष – शुक्ल
तिथि – अष्टमी सुबह १०:०६ तक तत्पश्चात् नवमी
नक्षत्र – श्रवण शाम ०६:३३ तक तत्पश्चात् धनिष्ठा
योग – शूल सुबह ०७:२१ तक, तत्पश्चात् गण्ड प्रातः ०६:१६ अक्टूबर ३१ तक, तत्पश्चात् वृद्धि
राहुकाल – दोपहर ०१:३५ से दोपहर ०३:००तक (उज्जैन मानक समयानुसार)
सूर्योदय – ०६:३१
सूर्यास्त – ०५:५० (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)
दिशा शूल – दक्षिण दिशा में
ब्रह्ममुहूर्त – प्रातः 04:50 से प्रातः 05:40 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)
अभिजीत मुहूर्त – सुबह ११:४८ से दोपहर १२:३३ (उज्जैन मानक समयानुसार
निशिता मुहूर्त – रात्रि ११:४५ से रात्रि १२:३६ अक्टूबर ३१ तक (उज्जैन मानक समयानुसार)*
व्रत पर्व विवरण – मासिक दुर्गाष्टमी, गोपाष्टमी
विशेष – नवमी को लौकी खाना गौमांस के समान त्याज्य है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: २७.२९-३४)
‘बुफे सिस्टम’ नहीं, भारतीय भोजन पद्धति है लाभप्रद
आजकल सभी जगह शादी-पार्टियों में खड़े होकर भोजन करने का रिवाज चल पडा है लेकिन हमारे शास्त्र कहते हैं कि हमें नीचे बैठकर ही भोजन करना चाहिए । खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ तथा पंगत में बैठकर भोजन करने से जो लाभ होते हैं वे निम्नानुसार हैं :
खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ
(१) यह आदत असुरों की है । इसलिए इसे ‘राक्षसी भोजन पद्धति’ कहा जाता है
२) इसमें पेट, पैर व आँतों पर तनाव पड़ता है, जिससे गैस, कब्ज, मंदाग्नि, अपचन जैसे अनेक उदर-विकार व घुटनों का दर्द, कमरदर्द आदि उत्पन्न होते हैं । कब्ज अधिकतर बीमारियों का मूल है ।
(३) इससे जठराग्नि मंद हो जाती है, जिससे अन्न का सम्यक् पाचन न होकर अजीर्णजन्य कई रोग उत्पन्न होते हैं ।
(४) इससे हृदय पर अतिरिक्त भार पड़ता है, जिससे हृदयरोगों की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं ।
(५) पैरों में जूते-चप्पल होने से पैर गरम रहते हैं । इससे शरीर की पूरी गर्मी जठराग्नि को प्रदीप्त करने में नहीं लग पाती ।
(६) बार-बार कतार में लगने से बचने के लिए थाली में अधिक भोजन भर लिया जाता है, फिर या तो उसे जबरदस्ती ठूँस-ठूँसकर खाया जाता है जो अनेक रोगों का कारण बन जाता है अथवा अन्न का अपमान करते हुए फेंक दिया जाता है ।
(७) जिस पात्र में भोजन रखा जाता है, वह सदैव पवित्र होना चाहिए लेकिन इस परम्परा में जूठे हाथों के लगने से अन्न के पात्र अपवित्र हो जाते हैं । इससे खिलानेवाले के पुण्य नाश होते हैं और खानेवालों का मन भी खिन्न-उद्विग्न रहता है ।
(८) हो-हल्ले के वातावरण में खड़े होकर भोजन करने से बाद में थकान और उबान महसूस होती है । मन में भी वैसे ही शोर-शराबे के संस्कार भर जाते हैं ।
बैठकर (या पंगत में) भोजन करने से लाभ
🔸 (१) इसे ‘दैवी भोजन पद्धति’ कहा जाता है ।
🔸 (२) इसमें पैर, पेट व आँतों की उचित स्थिति होने से उन पर तनाव नहीं पड़ता ।
🔸 (३) इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है, अन्न का पाचन सुलभता से होता है ।
🔸 (४) हृदय पर भार नहीं पड़ता ।
🔸 (५) आयुर्वेद के अनुसार भोजन करते समय पैर ठंडे रहने चाहिए । इससे जठराग्नि प्रदीप्त होने में मदद मिलती है । इसीलिए हमारे देश में भोजन करने से पहले हाथ-पैर धोने की परम्परा है ।
🔸 (६) पंगत में एक परोसनेवाला होता है, जिससे व्यक्ति अपनी जरूरत के अनुसार भोजन लेता है । उचित मात्रा में भोजन लेने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है व भोजन का भी अपमान नहीं होता ।
🔸 ७) भोजन परोसनेवाले अलग होते हैं, जिससे भोजनपात्रों को जूठे हाथ नहीं लगते । भोजन तो पवित्र रहता ही है, साथ ही खाने-खिलानेवाले दोनों का मन आनंदित रहता है ।
(८) शांतिपूर्वक पंगत में बैठकर भोजन करने से मन में शांति बनी रहती है, थकान-उबान भी महसूस नहीं होता












